गांव बलरा से बिदा होते वक्त जब मूल द्वार पर ताला लटका देख बाबूजी के आंखे छलछला आईं। मैं भी अतीत और वर्तमान स्मरण करते रहा।
फिर उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर घर को प्रणाम किया।
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