काठ के लोग

लोग काठ हो गए —
चलते हैं, साँस लेते हैं,
पर भीतर कहीं कुछ नहीं हिलता।
 
सवाल सामने खड़ा है,
बिलकुल नंगा,
फिर भी
होंठ सिल दिए गए हैं
जैसे चुप्पी ही अब नागरिक धर्म हो।
 
एक नहीं, दो नहीं—
पूरी बस्ती
लकड़ी के गोदाम में बदल गई है,
जहाँ विवेक दीमक बन चुका है
और डर स्थायी छत।
 
जो खुद को तारणहार कहते हैं,
वे दलदल को सड़क बता रहे थे,
अब उसी में
अपने ही नारों के साथ
धीरे-धीरे धँस रहे हैं।
 
और काठ के लोग—
तमाशा देख रहे हैं,
क्योंकि
जलने से पहले
लकड़ी चीखती नहीं।

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