प्रभुता के बाद

प्रभुता के बाद

(जब सूचना मिली कि विदेश में रहे नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री एवं नेपाली काग्रेस के पूर्व सभापति जो लोकतंत्र खातिर लम्बा संघर्ष के लिए भी जाने जाते हैं श्री शेर बहादुर देउवा दम्पती पर इन्टरपोल मार्फत नोटिस करने की तैयारी वर्तमान सरकार कर रही है तो जो भाव प्रस्फुटन हुआ वह निम्न हैं। ये कहां आ गए यूं ही साथ साथ चलते)

“प्रभुता पाई काहि मद नाहीं”—
कहते-कहते भी
इतिहास हर बार चुप हो जाता है,
क्योंकि उसे पता है
मद केवल सिर पर नहीं चढ़ता,
वह आँखों में उतरता है,
और वहाँ से सत्य को धीरे-धीरे बाहर कर देता है।
शासक
जब अपने कंधों पर
“जनता का सेवक” लिखी शॉल ओढ़ता है,
तो उसके भीतर
एक अदृश्य दरबार सजता है
जहाँ आईने नहीं होते,
केवल प्रशंसा की दीवारें होती हैं।
वह कहता है
मैं निर्दोष हूँ,
मैं प्रतिबद्ध हूँ,
मैं लोकतंत्र का प्रहरी हूँ।
और उसी क्षण
लोकतंत्र
अपनी जेब टटोलता है
देखता है,
उसका अधिकार कहीं गिर तो नहीं गया।
पाखंड
यहाँ कोई दुर्घटना नहीं है,
यह सत्ता की अनिवार्य भाषा है।
वह खुद को छुपाने के लिए नहीं,
खुद को सिद्ध करने के लिए
झूठ बोलता है।
लेकिन झूठ का भी एक समय होता है
वह टिकता है,
फिर थकता है,
और अंततः
अपने ही भार से गिर पड़ता है।
तब
सामने आता है
एक अजीब-सा मसखरापन
गंभीर चेहरों के पीछे
छिपा हुआ डर,
ऊँची आवाज़ों के भीतर
काँपती हुई असुरक्षा।
और जनता
जिसे वह दर्शक समझता था
धीरे-धीरे
दर्शक से प्रश्न बन जाती है।
प्रश्न
जो किसी मंच से नहीं उठता,
बल्कि
गली के मोड़ पर,
टूटी सड़क के किनारे,
और अधूरे नाले के पास
खामोशी से खड़ा रहता है।
वह पूछता है
तुमने कहा था,
तुम हमारे हो।
फिर यह दूरी क्यों?
वह पूछता है—
तुमने कहा था,
तुम प्रहरी हो।
फिर यह लूट किसकी है?
और शासक
जो हर प्रश्न का उत्तर तैयार रखता था
अचानक
शब्दहीन हो जाता है।
क्योंकि सत्ता
स्थायी नहीं होती,
और न ही उसका वैभव।
स्थायी होता है
केवल वह क्षण,
जब कोई मनुष्य
मनुष्यता के साथ खड़ा होता है।
राजनीति
यदि मनुष्यता की बात नहीं करती,
तो वह केवल प्रबंधन है
यदि वह लोक-निष्ठा नहीं जानती,
तो वह केवल नियंत्रण है
और यदि वह अधिनायक के विरुद्ध नहीं खड़ी होती,
तो वह स्वयं अधिनायक का विस्तार है।
इसलिए
हर शासक के लिए
एक अंतिम पाठ है
तुम्हारी सत्ता नहीं,
तुम्हारी निष्ठा याद रखी जाएगी।
तुम्हारे भाषण नहीं,
तुम्हारे निर्णय बोलेंगे।
और जब समय
अपना अंतिम निर्णय लिखेगा,
तो वह यह नहीं पूछेगा
तुम कितने शक्तिशाली थे,
बल्कि यह पूछेगा
तुम कितने मनुष्य थे।
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