ज़रूर

रात की चुप्पी में एक दुआ कहकर सो जाएँ,
संवाद जगे समाज में, नफ़रत खो जाएँ।
लोकतंत्र सशक्त हो, विवेक का हो उजास,
बंदूक नहीं, इंसानियत पहरे पर सो जाएँ।
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