सुकाल का विभ्रम

हम ऐसे समय के साक्षी हैं
जहाँ एक क्षण का आवेग
दशकों की नसों में ज़हर बन उतरता है।
 
जो घट रहा है, वह अचानक नहीं—
यह किसी निपुण पटकथाकार की
सोची-समझी,
मोहक, उत्तेजक, रसप्रिय रचना है।
 
यहाँ कोई हलाहल नहीं पीता,
सब ज़हर को
अमृत कहकर चाटते हैं।
 
हम —
दुस्साध्य बसंत से पहले
एक और पतझड़ झेलने को
अभिशप्त हैं।

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